आमदनी हर महीने एक जैसी नहीं? सेल्फ-एम्प्लॉयड और बिज़नेस करने वालों के लिए निवेश गाइड

आमदनी हर महीने एक जैसी नहीं? सेल्फ-एम्प्लॉयड और बिज़नेस करने वालों के लिए निवेश गाइड

डॉक्टर, वकील, कंसल्टेंट, ट्रेडर और बिज़नेस चलाने वाले — इन सबमें अक्सर एक बात मिलती है: हर महीने आमदनी एक जैसी नहीं आती। एक अच्छे महीने के बाद धीमा महीना आ सकता है, और बिज़नेस की ज़रूरतें और घर के गोल्स एक ही पैसे पर दावा करते हैं। अनियमित आमदनी के साथ भी निवेश पूरी तरह मुमकिन है, बस ढांचा थोड़ा अलग रखना पड़ता है।

सबसे पहले बिज़नेस का पैसा और घर का पैसा अलग कीजिए। दोनों के लिए अलग बैंक अकाउंट रखिए और हो सके तो बिज़नेस से खुद को हर महीने एक तय रकम दीजिए, बिल्कुल सैलरी की तरह। इससे घर का खर्च अंदाज़े के मुताबिक चलता है और साफ़ दिखता है कि निवेश के लिए असल में कितना बचता है — वरना बिज़नेस के बैलेंस को देखकर अंदाज़ा लगाना पड़ता है, जिसमें से सप्लायर, स्टाफ़ और टैक्स भी निकलने हैं।

इसके बाद, नौकरीपेशा लोगों के मुकाबले बड़ा कुशन बनाइए। तय सैलरी न होने पर एक धीमी तिमाही या अटका हुआ पेमेंट बिज़नेस और घर, दोनों पर दबाव डाल सकता है। इसीलिए कई सेल्फ-एम्प्लॉयड लोग बड़ा इमरजेंसी फंड रखते हैं और उसे बिज़नेस की वर्किंग कैपिटल से अलग रखते हैं, ताकि एक को बचाने के लिए दूसरे को तोड़ना न पड़े। आमदनी आते ही एडवांस टैक्स के लिए भी पैसा अलग रखते चलिए, ताकि टैक्स भरते वक्त निवेश में हाथ न डालना पड़े।

फिर निवेश को दो हिस्सों में सोचिए। एक बेस SIP रखिए — उतनी रकम की, जो धीमे महीने में भी आराम से चल सके — और अच्छे महीनों में या कोई बड़ा पेमेंट आने पर लंपसम जोड़िए। अगर बड़ी धनराशि एक साथ नहीं लगाना चाहते, तो STP के ज़रिए उसे धीरे-धीरे बाज़ार में लगाया जा सकता है। कई स्कीमों में शर्तों के हिसाब से SIP रोकी या बदली जा सकती है, लेकिन बेस रकम को पक्का मानकर चलने से ही आदत बनती है। याद रखिए, म्यूचुअल फंड निवेश बाज़ार से जुड़े होते हैं और उनकी वैल्यू घट भी सकती है, बढ़ भी सकती है।

आख़िर में, वो चीज़ें खुद बनाइए जो नौकरी में एम्प्लॉयर से अपने-आप मिल जाती हैं। यहां न PF अपने-आप कटता है, न ग्रेच्युटी मिलती है, इसलिए रिटायरमेंट जैसे लंबी अवधि के गोल्स के लिए अलग से निवेश ज़रूरी है — और उसे बिज़नेस के पैसे से अलग रखिए, ताकि पहली ज़रूरत पर वह वापस बिज़नेस में न चला जाए। थोड़े समय की नकदी की कमी के लिए कुछ निवेशक अपनी म्यूचुअल फंड यूनिट्स बेचने के बजाय उन पर लोन लेने का विकल्प देखते हैं। लेकिन यह भी आख़िर लोन ही है — इस पर ब्याज लगता है और बाज़ार गिरने पर मार्जिन की कमी का जोखिम रहता है, इसलिए सोच-समझकर फैसला कीजिए। ये बातें सामान्य जानकारी हैं; आपके बिज़नेस और गोल्स के हिसाब से असली तस्वीर अलग हो सकती है।

अनियमित आमदनी के साथ म्यूचुअल फंड निवेश आपके लिए कैसे काम कर सकता है, यह आपकी रिस्क प्रोफाइल और लक्ष्यों के हिसाब से समझने के लिए नोएडा में Finglow की टीम से बात करें।

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